हमारे अन्दर कि बड़- बड़ चलती ही रहती है कुछ क्षण ऐसे भी होते है जब अन्दर कि बड़- बड़ तीव्र हो जाती है लेकिन कुछ क्षण ऐसे भी होते है जब अन्दर कि बड़- बड़ शुन्य हो जाती है | जब मन शांत होते है तब निर्णय सही व अच्छे होता है लेकिन यदि मन अशांत हो तो निर्णय गलत ही होते है | तो क्या अभी इंसान अपने मन को नियंत्रण में करना का सोचता है?
यदि यह हो जाए तो चीजे बदल जाएगी | अन्दर कि बड़- बड़ के पीछा हमारा स्वार्थ और हमारा डर होता है और हमारी समझ में कमी होती है |
किसी भी काम को हम यदि समझ समझ के करे बिना यह सोचे कि इससे मुझे क्या फायदा होगा और और अपना सारा ध्यान अपने काम में लगाए तब हमारे अन्दर कि बड़ -बड़ धीरे धीरे हमारे नियंत्रण में आने लग जाएगी | जिस प्रकार समुद्र में लहरे उठती और ख़त्म होती है लकिन लहरे बनना ख़त्म नहीं होता उसी प्रकार विचार ख़त्म कभी नहीं होती लेकिन नियंत्रण में आ जाती है (लहरों का आकर ) जिससे मन शांत हो जाता है |
जब हम अत्यधिक सोचते है तब हमारी ऊर्जा बिखरी हुई होती है लेकिन जब हम सोचना बंद करके अपने काम पे ध्यान देता है तब हमारी सारी ऊर्जा एक जगह पर केन्द्रित होती है और परिणम हमारे अनुकूल होता है |
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